पौड़ी गढ़वाल ( लैंसडौन)। पर्यटन नगरी लैंसडौन का नाम बदलने को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका यह ऐतिहासिक हिल स्टेशन आज अपने नाम और पहचान को लेकर चर्चा में है।
पर्यटन के क्षेत्र में यह नगर न केवल उत्तराखंड की रीढ़ बन चुका है, बल्कि हर साल करोड़ों रुपये का राजस्व भी सरकार को देता है। इसके बावजूद बुनियादी सुविधाओं के अभाव और विकास की धीमी रफ्तार से स्थानीय लोग असंतुष्ट हैं।
नाम बदलने की सूची में शामिल लैंसडौन
ब्रिटिश शासनकाल में रखे गए शहरों के नाम बदलने की कवायद के तहत लैंसडौन का नाम भी सूची में शामिल किया गया है। इसके लिए प्रशासन द्वारा जनता से सुझाव और आपत्तियां भी मांगी गई हैं।
हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि नाम बदलने से विकास नहीं होगा, बल्कि असली जरूरत बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की है।
विकास पर सवाल, पलायन बढ़ा
लैंसडौन कैंट क्षेत्र होने के कारण विकास कार्यों में बाधाएं आ रही हैं। आर्थिक तंगी से जूझ रहा कैंट बोर्ड कर्मचारियों के वेतन और योजनाओं के लिए भी संघर्ष कर रहा है।
रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी के चलते पिछले एक दशक में पलायन की समस्या भी बढ़ी है।
पहले भी उठ चुके हैं नाम बदलने के प्रस्ताव
लैंसडौन का नाम बदलने की मांग पहले भी उठ चुकी है। कभी इसे कालौडांडा, कभी लाट सूबेदार बलभद्र सिंह नेगी और कभी सीडीएस जनरल विपिन रावत के नाम पर रखने के प्रस्ताव सामने आए, लेकिन कोई भी योजना धरातल पर नहीं उतर सकी।
जनता की राय: पहचान से समझौता नहीं
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि लैंसडौन का नाम क्षेत्र की भावनाओं और पहचान से जुड़ा है।
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. एसपी नैथानी ने कहा कि नाम बदलने का विरोध किया जाएगा क्योंकि यह नगर केवल एक नाम नहीं बल्कि लोगों की पीढ़ियों की पहचान है।
