पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड का वीवीआईपी जिला कहलाता है, इस जिले से 5 मुख्यमंत्री, अनेक मंत्री और बड़े केंद्रीय अफसर हैं
पौड़ी गढ़वाल: चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र में सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते ग्रामीणों की मुश्किलें लगातार सामने आ रही हैं. सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में बीमार महिला को ग्रामीण कंधों पर उठाकर पैदल ले जाते दिखाई दे रहे हैं. दिलचस्प बात ये है कि पौड़ी गढ़वाल को उत्तराखंड का वीवीआईपी जिला कहा जाता है. इस जिले ने उत्तराखंड को 5 मुख्यमंत्री और कई मंत्री और केंद्रीय स्तर के अफसर दिए हैं. इससे भी चौंकाने वाली बात ये है कि इस समय स्वास्थ्य और पीडब्ल्यूडी मंत्री भी पौड़ी गढ़वाल जिले के ही हैं.
वीवीआईपी जिले के लोग सड़क और पुल को तरसे: बताया जा रहा है कि मामला पौड़ी गढ़वाल के बीरोंखाल ब्लॉक के ग्राम डांगू मल्लाका का है. ग्रामीणों के अनुसार खतलगढ़ के ऊपर पुल नहीं होने के कारण मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए उन्हें नदी पार कर पैदल रास्ता तय करना पड़ा. पहाड़ों में सड़क तक मरीज को पालकी या कंधों के सहारे पहुंचाने के ऐसे वीडियो लगातार सामने आ रहे हैं. वायरल वीडियो ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
VVIP जिला सड़क-स्वास्थ्य सुविधा को तरसा
स्वास्थ्य सुविधा और सड़क समस्या की पौड़ी की तस्वीरें हैं आम: चौबट्टाखाल क्षेत्र में सड़क सुविधा की बदहाली की तस्वीर पहली बार सामने नहीं आई है. इससे पहले कमलिया पल्ला गांव का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें सड़क नहीं होने के कारण एक व्यक्ति अपनी बीमार पत्नी को करीब 6 से 7 किलोमीटर तक कंधे पर उठाकर ले जाता दिखाई दिया था. अब एक और वीडियो ने पहाड़ में बदहाल सड़क व्यवस्था और ग्रामीणों की मजबूरी को फिर सामने ला दिया है. दोनों ही मामलों में ग्रामीण लंबे समय से सड़क और संपर्क मार्ग की मांग करते आ रहे हैं. इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं होने से ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ रही है
सड़क और पुल के अभाव में 60 वर्षीय बीमार बुजुर्ग महिला को डोली पर ले जाते लोग
पौड़ी जिले से हैं पीडब्ल्यूडी मंत्री: ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र के विधायक और प्रदेश के लोक निर्माण विभाग (PWD) मंत्री सतपाल महाराज के कार्यकाल में भी कई गांव सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. ग्रामीणों का कहना है कि विभागीय स्तर पर सर्वे, कार्रवाई और आश्वासन तो मिलते हैं, लेकिन धरातल पर हालात में अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आता.
